शास्त्रों की मान्यता है की व्यक्ति अपने आराध्य देव की पूजा नियमित और श्रद्धा भाव से करते है , उन पर प्रतिकूल ग्रहों का प्रभाव कम पड़ता है | आपके आराध्य कौन होंगे , इसकी जानकारी आप अपनी जन्म पत्रिका से किसी ज्योतिषी से प्राप्त कर सकते है | कुंडली से इसका ज्ञान प्राप्त करके पूजा - पाठ प्रारंभ करने से सभी कष्टों में आराम मिल सकता है | कुंडली में पंचम भाव आराध्य देव का और नवम भाव धर्म अनुष्ठान का , दशम भाव कर्म क्षेत्र का होता है | कुंडली में पंचम भाव में पुरुष ग्रह स्थित हो या पंचम भाव पर पुरुष ग्रहों का प्रभाव और द्रष्टि हो तो व्यक्ति पुरुष देवताओ की आराधना करता है | यदि पंचम भाव में बुध ग्रह स्थित हो अथवा पंचम पर बुध ग्रह की द्रष्टि हो तो आपके इष्ट देव भगवान गणेश और विष्णु होंगे | भगवान विष्णु के अंश अवतारों की पूजा अर्चना करने से जल्दी लाभ होता है यदि पंचम भाव में सूर्य चन्द्रमा हो अथवा इसकी पंचम पर द्रष्टि हो तो आपकी आराध्य माँ गौरी होगी | यदि पंचम में मंगल ग्रह हो या पंचम पर मंगल की द्रष्टि हो तो आपके आराध्य भगवान कार्तिकेय होंगे | मंगल को ग्रहों का सेनापति कहा गया है | और कार्तिकेय को देवताओ का सेनापति | कार्तिकेय के अतिरिक्त हनुमान जी आपके आराध्य देव हो सकते है | यदि पंचमेश मंगल भाग्य स्थान में बैठा हो अथवा पंचमेश होकर भाग्य स्थान पर द्रष्टि डालता हो तो आपके लिए भगवान शंकर की आराधना अधिक फल दाई होगी | यदि पंचम भाव में वृहस्पति हो अथवा पंचम भाव पर द्रष्टि हो तो भी आपके आराध्य भगवान शंकर होंगे | यदि पंचम भाव में शुक्र हो अथवा शुक्र की द्रष्टि हो , तो आपके आराध्य देव माँ दुर्गा , माँ वैष्णवी और संतोषी माँ होंगी | यदि कुंडली में पंचमेश भाग्येश दशमेश तीनो आदर्श भाव हो , वृहस्पति लग्नेश होकर लग्न में हो , तो ऐसा व्यक्ति भक्ति एवं अनुष्ठान के क्षेत्र में जा सकता है क्यों की वृहस्पति की पंचम एवं नवम पर पूर्ण द्रष्टि होती है | यदि पांचवा भाव सम राशी में हो और चन्द्रमा एवं शुक्र बैठे हो अथवा चन्द्र - शुक्र की द्रष्टि हो , तो व्यक्ति को किसी स्त्री देवता की आराधना से लाभ होगा | यदि शनि राहू पंचम स्थान में हो , तो व्यक्ति अन्य देवी देवता की पूजा करता है |
सूर्य की पूजा विधि -:
प्रात : स्नान कर ताम्बे के बर्तन में पानी ले | उसमे चुटकी भर चावल डाले , लाल चन्दन के छीटे दे और लाल पुष्प डालकर "ॐ सूर्य सूर्याय नम : " बोलते हुए सूर्य भगवान को पानी चढ़ाए तथा जल चढाने के पश्चात् सात परिक्रमा करे और आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करे | मन को शुद्ध करने के लिए चाहे तो रविवार का उपवास व्रत भी कर सकते है |
गौरी पूजा विधि -:
प्रात : स्नान करके तांबे के पात्र में पानी ले | शिव मंदिर जाये | सर्वप्रथम गणेश जी को जल चढाए और माँ का श्रंगार करे व् उनकी पूजा करे |
हनुमान जी की पूजा -:
मंगल वार को हनुमान जी के यहाँ चने और गुड तथा शनि वार को भीगे हुए चने और गुड चढ़ाए , हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का पाठ करे | इससे व्यक्ति को सभी प्रकार के कष्टों में आराम विशेष रूप से शनि ग्रह की ढयया साढ़े सती अथवा महादशा से होने वाले कष्टों में राहत मिल सकती है |
भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा -:
मंदिर में खली हाथ न जाये | फुल , अगरबत्ती आदि चढ़ाए तथा चार परिक्रमा करे | परिक्रमा करते वक्त " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम : " मंत्र का जाप करते जाए तथा मंदिर में तुलसी चरणामृत का सेवन करे |
भगवान शिव -:
प्रात : स्नान कर तांबे के पात्र में जल और दूध से शिव जी का अभिषेक करे | सर्वप्रथम शिव परिवार को जल चढ़ाए तथा अंत में शिव जी को " ॐ नम : शिवाय " बोलते हुए जल , दूध चढ़ाए | शिव जी का चरणामृत नहीं लिया जाता है | शिव जी की केवल आधी परिक्रमा होती है | शनि वार राहू ग्रह के प्रकोप से बचने के लिए शिव जी का पानी के साथ काले तिलों से भी अभिषेक किया जाए तो लाभ प्राप्त होता है |
गणेश -:
बुधवार को गणेश जी के डोब चढ़ाए और तीन परिक्रमा करे | मुंग के लद्दुओ का भोग लगाए | परिक्रमा करते समय " ॐ गण गणपतये नम : " का मन में उच्चारण करते रहे और हो सके तो गणेश चालीसा का पाठ करे |
माँ दुर्गा की पूजा -:
माँ को प्रसन्न करने के लिए नवरात्र में माँ भगवती की पूजा अर्चना करे | दुर्गा सप्तशती का श्रद्धा भाव से पाठ करे | जो व्यक्ति प्रतिदिन माँ दुर्गा की आराधना करना चाहते है वे केवल कवच , अगर्ला , किलक और ग्याहरवे और बारहवे अध्याय का पाठ करके अंत में क्षमा याचना करके अपने सभी कष्टों से मुक्ति पा
सकते है | बिना आसन , चलते फिरते पैर फैलाकर पाठ करना निषेध है |
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